यमन में फांसी की सजा भुगत रही भारतीय नागरिक निमिषा प्रिया को बचाने के लिए दायर याचिका की सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। यह सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ के सामने हुई। इस दौरान भारत सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकट रमणि ने सरकार की स्थिति कोर्ट को बताई। उन्होंने कहा कि यमन के संवेदनशील हालात को देखते हुए सरकार सीमित कदम ही उठा सकती है और वह अपनी पूरी सीमा तक पहुँच चुकी है।
याचिकाकर्ता की मांग और सरकार की स्थिति
याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि निमिषा की मां यमन में घरेलू कामगार हैं और वे परिवार से बातचीत के लिए सरकार से मदद चाहते हैं। उनकी मांग है कि सरकार मृत्युदंड को टालने के लिए परिवार से बात करे क्योंकि आर्थिक मुआवजे का भी इससे संबंध है। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि यमन की संवेदनशीलता के कारण सरकार के लिए सीमित ही विकल्प हैं क्योंकि यमन को आधिकारिक रूप से राजनयिक मान्यता नहीं मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार प्रयास कर रही है और अगले शुक्रवार फिर से इस मामले की सुनवाई होगी।

कोर्ट का सवाल और समाधान की कोशिशें
न्यायाधीशों ने पूछा कि कोर्ट इस मामले में क्या आदेश दे सकता है और कौन उसका पालन करेगा। याचिकाकर्ता के वरिष्ठ वकील ने कहा कि स्थानीय दूतावास के अधिकारी और कुछ अच्छे लोग जेल जाकर मां से मिल सकते हैं और बातचीत कर सकते हैं, जिससे स्थिति में सुधार हो सकता है। अटॉर्नी जनरल ने बताया कि सरकार हर संभव कोशिश कर रही है लेकिन अब यह मामला एक तरह के गतिरोध में है। कोर्ट ने मामले को कुछ दिन के लिए टालते हुए फिर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।
मामला क्या है और आगे क्या होगा?
निमिषा प्रिया पर 2017 में एक यमनी नागरिक की हत्या का आरोप है, जिसने कथित तौर पर उसे प्रताड़ित किया था। अपने पासपोर्ट वापस पाने के लिए उन्होंने आरोपी को बेहोश करने की कोशिश की, जिसके कारण उसकी मौत हो गई। इसके लिए उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई है और उनकी फांसी 16 जुलाई को हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वे इस मामले में सकारात्मक हल की उम्मीद करते हैं और शुक्रवार को फिर सुनवाई करेंगे।







