हर त्योहार के साथ देश में नए विवाद उभरते नजर आ रहे हैं। मध्य प्रदेश में नवरात्रि के दौरान गरबा जिहाद का मुद्दा सामने आया, और अब करवा चौथ के अवसर पर मेहंदी जिहाद को लेकर विवाद गरमा गया है। साधु-संत और हिंदू संगठन हिंदू महिलाओं से अपील कर रहे हैं कि वे केवल अपने धर्म के लोगों से ही हाथों पर मेहंदी लगवाएं। करवा चौथ के दिन महिलाएं अपने पतियों की लंबी उम्र की कामना करते हुए व्रत रखती हैं, श्रृंगार करती हैं और हाथों पर मेहंदी लगवाती हैं। लेकिन इस बार मेहंदी केवल रंग नहीं रही, बल्कि यह नया विवाद भी बन गया है।
पूरा मामला क्या है?
भोपाल हिंदू समिति के अध्यक्ष चंद्रशेखर तिवारी ने हिंदू महिलाओं से अपील की है कि यदि वे गैर-हिंदुओं से मेहंदी लगवाती हैं, तो उनके साथ कुछ गलत हो सकता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को केवल उन्हीं के साथ त्योहार मनाना, व्यापार करना और मेल-जोल रखना चाहिए, जो हमारे सनातन धर्म में विश्वास रखते हों। यदि कोई सनातन धर्म का व्यक्ति उनके हाथों पर मेहंदी लगाएगा तो कोई समस्या नहीं होगी, लेकिन अगर कोई जिहादी हाथ लगाए तो उसके मन में बुराई हो सकती है। तिवारी ने उदाहरण देते हुए कहा कि फल, प्रसाद, माला और रोटियों पर थूकना जिहाद के तहत देखा गया है, लेकिन मेहंदी पर थूकना नया मुद्दा है, जिसे हम नहीं जान पाएंगे।

विवाद की शुरुआत कहाँ हुई?
दरअसल, इस अभियान की शुरुआत उज्जैन के दादू आश्रम के महामंडलेश्वर ज्ञान दास ने की थी। उन्होंने कहा कि महिलाओं को गैर-हिंदुओं से मेहंदी नहीं लगवानी चाहिए, क्योंकि यह प्रेम जिहाद को बढ़ावा देता है। इसके बाद भोपाल में हिंदू संगठनों ने एक विशेष टीम बनाई और गैर-हिंदुओं से मेहंदी लगवाने वालों को रोकने की दिशा में काम शुरू किया। बीजेपी विधायक रमेश्वर शर्मा ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त की और कहा, “सनातन मेहंदी लगवाएं। अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति से मेहंदी लगवाते हैं, जो करवा चौथ नहीं मनाता, तो कौन जाने वह किस प्रकार की मेहंदी लगाए। हमें सतर्क रहना चाहिए।”
महिलाओं की राय और विरोध
भोपाल में कुछ महिलाओं ने भी कहा कि गैर-हिंदुओं से मेहंदी नहीं लगवानी चाहिए और अपने धन का उपयोग अपने समुदाय में ही करना चाहिए। वहीं, जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर शैलेश आनंद गिरी महाराज ने इस विवाद पर अपनी राय रखते हुए कहा, “जो अपनी इच्छा से मेहंदी लगवाना चाहता है, उसे करने दें। यह उनका व्यक्तिगत निर्णय है। धार्मिक कट्टरता को इस मामले में सामने नहीं लाना चाहिए।” इस बयान ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत पसंद और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है, जबकि समाज में धर्म के नाम पर बढ़ते विवाद को भी समझना आवश्यक है।







