उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में हाल ही में सामने आई एक घटना ने पूरे देश में धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। गांव के कुछ लोगों ने शिकायत की कि एक खाली मकान में बिना अनुमति सामूहिक नमाज अदा की जा रही थी और वहां अस्थायी मदरसा भी चलाया जा रहा था। शिकायत के बाद पुलिस ने मौके पर कार्रवाई करते हुए 12 लोगों को हिरासत में ले लिया। इस कार्रवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि क्या कोई व्यक्ति अपने ही घर में नमाज या अन्य धार्मिक प्रार्थना करने के लिए सरकार या प्रशासन से अनुमति लेने को बाध्य है। इसी संवेदनशील मुद्दे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति या समुदाय को अपनी निजी संपत्ति पर शांतिपूर्वक पूजा या नमाज अदा करने के लिए राज्य या स्थानीय प्रशासन से किसी प्रकार की पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यदि धार्मिक गतिविधि पूरी तरह निजी परिसर में हो रही है और उससे किसी को कोई बाधा नहीं पहुंचती तो वह पूरी तरह संवैधानिक संरक्षण के अंतर्गत आती है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि निजी घर में आयोजित प्रार्थना सभा के लिए अनुमति मांगना संविधान की भावना के खिलाफ होगा। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि प्रशासन को केवल इस आधार पर हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है कि कोई धार्मिक गतिविधि हो रही है।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 पर विशेष जोर दिया। अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने पालन करने और उसका प्रचार करने का मौलिक अधिकार देता है। यह अधिकार सामान्य परिस्थितियों में सीमित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति या समूह अपनी मर्जी से और शांति के साथ अपने निजी घर में धार्मिक अनुष्ठान करता है तो राज्य को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। यह फैसला साफ संकेत देता है कि धार्मिक स्वतंत्रता भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी नींव है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि धार्मिक स्वतंत्रता पूर्ण रूप से निरंकुश नहीं है। यह सुरक्षा केवल तब तक लागू होती है जब धार्मिक गतिविधि पूरी तरह निजी संपत्ति तक सीमित रहे। यदि नमाज या अन्य धार्मिक आयोजन सार्वजनिक स्थानों तक फैलता है। सड़कों को अवरुद्ध करता है। शोरगुल से पड़ोसियों को परेशानी होती है। या कानून व्यवस्था और सार्वजनिक शांति के लिए खतरा बनता है। तो प्रशासन को हस्तक्षेप करने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर होने वाले धार्मिक जुलूस सभाएं या कार्यक्रमों के लिए स्थानीय प्रशासन या पुलिस से अनुमति लेना जरूरी है ताकि ट्रैफिक प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके। यह फैसला आने वाले समय में धार्मिक अधिकारों और प्रशासनिक संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है।







