कैंसर का पहला और दूसरा चरण अक्सर पहचान से दूर रहता है। ज्यादातर मामलों में जब कैंसर तीसरे या चौथे चरण तक पहुंचता है तब तक स्थिति गंभीर हो चुकी होती है। तब इलाज मुश्किल और मरीज की जान को खतरा भी बढ़ जाता है। यह सवाल उठता है कि आखिर कैंसर को शुरुआती चरण में क्यों पकड़ पाना इतना मुश्किल होता है। डॉक्टर वैष्णवी जमरे, जो सर्जिकल ऑन्कोलॉजी और ब्रेस्ट कैंसर सर्जरी की हेड हैं, बताती हैं कि इसके कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण यह है कि कैंसर अपने शुरुआती चरणों में चुपचाप रहता है और इसके लक्षण आम बीमारियों जैसे होते हैं, जिससे पहचान मुश्किल हो जाती है।
पहले और दूसरे चरण के कैंसर के लक्षण
प्रारंभिक चरण में कैंसर से दर्द नहीं होता, इसलिए लोग इसे हल्के में लेते हैं। इस चरण के लक्षण बहुत मामूली होते हैं, जैसे लगातार थकान महसूस होना, हल्का सूजन, पेट में एसिडिटी या बिना कारण वजन कम होना। इन लक्षणों को लोग आम बीमारियों के रूप में नजरअंदाज कर देते हैं। कई लोग जांच कराने में भी देर करते हैं और सोचते हैं कि अभी मैं ठीक हूं, बाद में करवा लूंगा। यह सोच कैंसर की शुरुआती पहचान में बड़ी बाधा बन जाती है। अगर समय पर जांच न हो तो कैंसर तेजी से बढ़ सकता है।
पहले दो चरणों में कैंसर की पहचान क्यों मुश्किल होती है?
कैंसर को लेकर समाज में भय और गलतफहमियां होती हैं। खासकर गांवों और छोटे शहरों में इसे शर्मनाक बीमारी माना जाता है। इसी कारण लोग जांच कराने से हिचकिचाते हैं। महिलाओं में स्तन या अन्य निजी अंगों की जांच को लेकर जागरूकता की कमी भी बड़ी समस्या है। इसके अलावा, युवाओं में कैंसर का खतरा कम समझा जाता है, इसलिए वे और डॉक्टर भी शुरुआत में इसे शक की नजर से नहीं देखते। लेकिन जो सबसे जरूरी बात है वह यह है कि अगर शरीर में कोई भी नया लक्षण दिखे जो लगातार बना रहे या धीरे-धीरे बढ़ता रहे, तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, चाहे दर्द हो या न हो।
सावधानी और जागरूकता ही बचा सकती है जान
डॉक्टर वैष्णवी जमरे का कहना है कि कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए समय-समय पर जांच कराना बेहद जरूरी है। अगर हम लक्षणों को नजरअंदाज करेंगे तो स्थिति गंभीर हो जाएगी। जागरूकता फैलाना और लोगों को भयमुक्त करना सबसे बड़ा कदम है। खासकर महिलाओं को उनके स्वास्थ्य को लेकर सजग रहना चाहिए और जांच कराने से डरना नहीं चाहिए। याद रखें, कैंसर के शुरुआती लक्षण भले ही मामूली लगें, लेकिन जांच कराकर समय रहते इलाज शुरू किया जा सकता है। यही सही रास्ता है जीवन बचाने का।







