क्या आप जानते हैं कि जिस कच्चे तेल को विदेशों से मंगवाया जाता है, वह सिर्फ आपकी गाड़ी की टंकी तक ही सीमित नहीं है? पेट्रोलियम पदार्थ आधुनिक सभ्यता की रीढ़ हैं। सुबह रसोई में जलने वाली गैस से लेकर सड़क पर दौड़ती गाड़ियां और प्लास्टिक जैसी चीजें सभी इसी काले सोने की देन हैं। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है। यहां रोजाना लाखों बैरल कच्चे तेल को रिफाइनरियों में अलग-अलग उत्पादों में बदलकर देश की रफ्तार बनाए रखने में इस्तेमाल किया जाता है।
पेट्रोलियम रिफाइनिंग और वर्गीकरण
कच्चा तेल जब जमीन या समुद्र के नीचे से निकाला जाता है, तो सीधे इस्तेमाल के योग्य नहीं होता। भारत की विशाल रिफाइनरियों में इसे ऊंचे तापमान पर गर्म किया जाता है, जिसे ‘फ्रैक्शनल डिस्टिलेशन’ कहते हैं। इस प्रक्रिया में तेल के हिस्से उनके उबलने के तापमान के आधार पर अलग हो जाते हैं। सबसे हल्के हिस्से एलपीजी गैस के रूप में ऊपर मिलते हैं, जबकि सबसे भारी हिस्से जैसे बिटुमेन नीचे जमा होते हैं। भारत में इस प्रक्रिया से पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, एविएशन फ्यूल, लुब्रिकेंट्स और कई अन्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं, जो देश की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करते हैं।
डीजल, पेट्रोल और एलपीजी की बढ़ती खपत
भारत में हाई स्पीड डीजल सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला पेट्रोलियम उत्पाद है। अनुमानित आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में इसकी खपत 85,985 हजार मीट्रिक टन के करीब है। डीजल ट्रक, बस, रेलवे इंजन, कृषि ट्रैक्टर और सिंचाई पंपों में इस्तेमाल होता है। पेट्रोल की खपत 38,807 हजार मीट्रिक टन है, जो मुख्य रूप से कारों और दोपहिया वाहनों में इस्तेमाल होती है। एलपीजी की खपत 30,855 हजार मीट्रिक टन के आसपास है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के जरिए एलपीजी को ग्रामीण इलाकों में भी पहुंचाया गया है। इसके अलावा अब ऑटो-एलपीजी के रूप में वाहनों में भी इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है।
अन्य पेट्रोलियम उत्पाद और भारत की ऊर्जा सुरक्षा
एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) हवाई जहाजों के लिए प्रयोग होता है और इसकी खपत 8,355 हजार मीट्रिक टन है। नैफ्था पेट्रोकेमिकल उद्योगों में इस्तेमाल होता है। बिटुमेन और पेट्रोकोक सड़क निर्माण और भारी उद्योगों में प्रयोग किए जाते हैं। लुब्रिकेंट्स मशीनों के घर्षण को कम करने में मदद करते हैं और सालाना 4,471 हजार मीट्रिक टन खपत होती है। भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। बढ़ती खपत के कारण भारत अब एथेनॉल ब्लेंडिंग और इलेक्ट्रिक वाहनों पर जोर दे रहा है ताकि विदेशी निर्भरता कम की जा सके।







