पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की आग अब दुनिया की गैस पाइपलाइन कहे जाने वाले कतर तक पहुँच गई है। ईरान द्वारा किए गए हालिया हमलों ने कतर की एलएनजी (LNG) उत्पादन क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। कतर एनर्जी के सीईओ साद अल-काबी के अनुसार इन हमलों में लगभग 17 प्रतिशत निर्यात क्षमता नष्ट हो गई है। यह केवल कतर के लिए 20 अरब डॉलर के राजस्व का नुकसान नहीं है, बल्कि भारत जैसे उन देशों के लिए भी खतरे की घंटी है जो अपनी गैस जरूरतों के लिए पूरी तरह कतर पर निर्भर हैं।
हमलों का असर कतर के गैस ठिकानों पर
इन हमलों में कतर की 14 एलएनजी ट्रेनों में से कम से कम दो को गंभीर नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा, दो प्रमुख गैस-टू-लिक्विड (GTL) सुविधाओं में से एक भी क्षतिग्रस्त हो गई है। साद अल-काबी ने बताया कि मरम्मत में 3 से 5 साल का समय लग सकता है, जिसके कारण प्रति वर्ष लगभग 12.8 मिलियन टन एलएनजी का उत्पादन बाधित रहेगा। इससे चीन, यूरोप और भारत की ओर आने वाले गैस टैंकरों की संख्या में कमी आएगी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अफरा-तफरी का माहौल बनेगा।
भारत की कतर पर भारी निर्भरता
वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत अपनी कुल एलएनजी आयात का लगभग 46.8 से 47 प्रतिशत हिस्सा अकेले कतर से मंगवाता है। भारत सालाना लगभग 11 से 11.3 मिलियन टन एलएनजी कतर से हासिल करता है। प्रमुख कंपनी पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड ने कतर के रास लफान से गैस मंगाने के लिए 2048 तक के लंबे समय के समझौते किए हुए हैं। सप्लाई में रुकावट का मतलब है कि भारत को अपनी आधी गैस जरूरतों के लिए नए और महंगे विकल्प तलाशने होंगे, जिससे ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा असर पड़ेगा।
गैस संकट के प्रभाव: उर्वरक, रसोई और बिजली
कतर से गैस की सप्लाई बाधित होने पर सबसे पहले भारत का उर्वरक उद्योग प्रभावित होगा। यूरिया उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस आवश्यक है, सप्लाई रुकने से उत्पादन घटेगा और कीमतें बढ़ेंगी। आम आदमी के लिए सीएनजी और पीएनजी की कीमतों में उछाल आएगा। बिजली संयंत्र और औद्योगिक क्षेत्र भी प्रभावित होंगे, जिससे उत्पादन घटेगा और देश की GDP और विकास दर पर असर पड़ेगा। यह संकट मध्यम वर्ग और उद्योगों दोनों के लिए गंभीर चुनौती बन गया है।







