भारत और रूस के बीच तेल व्यापार में वृद्धि की खबर सामने आई है। पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने अब अगस्त 2025 के मुकाबले सितंबर में रूसी क्रूड ऑयल की खरीद को 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़ाने का निर्णय लिया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब यूक्रेन द्वारा किए गए ड्रोन हमले के कारण रूस के रिफाइनरी पर काफी नुकसान हुआ है और उसकी प्रसंस्करण क्षमता भी कम हो गई है। इस कारण रूसी तेल विक्रेता कीमतों को घटाकर अपनी बिक्री बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
भारत के लिए सस्ता तेल और लाभ-हानि
पश्चिमी देशों द्वारा 2022 में रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद भारत रूस का बड़ा तेल खरीदार बन गया। इस सस्ते तेल से भारतीय रिफाइनर अपने तेल की कीमतों को सामान्य बनाए रख पा रहे हैं। हालांकि, आलोचना यह भी हुई है कि इस सस्ते तेल के लाभ सीधे आम जनता तक नहीं पहुँच रहे हैं। इसके बावजूद, भारत की तेल सुरक्षा सुनिश्चित करने और घरेलू तेल उत्पादकों को राहत देने के लिए यह निर्णय महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अमेरिका की प्रतिक्रिया और टैरिफ
भारत की रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका ने नाराज़गी जताई है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 27 अगस्त 2025 से भारतीय वस्तुओं जैसे कपड़े और आभूषण पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने का निर्णय लिया। यह कदम भारत पर आर्थिक दबाव डालने के लिए उठाया गया है। अमेरिका का उद्देश्य रूस पर भारत के सहयोग को रोकना और वैश्विक मंच पर अपनी रणनीति को सुदृढ़ करना है। टैरिफ बढ़ने से भारत के निर्यातकों और श्रमिकों पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
कूटनीतिक प्रयास और भारत की रणनीति
टैरिफ विवाद के बावजूद भारतीय अधिकारी अमेरिकी प्रशासन के साथ वार्ता जारी रखे हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार रूस और चीन के साथ संबंधों को मजबूत करने और व्यापारिक साझेदारी को बढ़ाने के लिए सक्रिय हैं। भारत का उद्देश्य न केवल ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद अपने आर्थिक हितों की रक्षा करना भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि सस्ते रूसी तेल का यह कदम भारत की लंबी अवधि की ऊर्जा रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और वैश्विक बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को बनाए रखने में मदद करेगा।







