अमेरिकी फेडरल रिज़र्व के चेयरमैन जेरोम पॉवेल ने बुधवार को फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) की बैठक के बाद बड़ा फैसला सुनाया। अमेरिका में बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई को देखते हुए फेडरल रिज़र्व ने 25 बेसिस प्वाइंट (0.25%) की कटौती की घोषणा की। इस कटौती के बाद अमेरिका की प्रमुख ब्याज दरें 4.25%–4.5% से घटकर 4.00%–4.25% पर आ गई हैं। यह इस साल की पहली दर कटौती है। आखिरी बार अमेरिका में दिसंबर 2024 में ब्याज दरों में कमी की गई थी। बैठक 16 सितंबर को शुरू हुई थी और 18 सितंबर को इसके नतीजे घोषित किए गए।
फेडरल रिज़र्व का आधिकारिक बयान
फेडरल रिज़र्व ने अपने बयान में कहा, “हाल के संकेतक बताते हैं कि साल की पहली छमाही में आर्थिक गतिविधियाँ धीमी रहीं। नौकरी की वृद्धि कम हुई है और बेरोजगारी दर बढ़ी है, हालांकि यह अभी भी अपेक्षाकृत कम स्तर पर है। महंगाई में बढ़ोतरी हुई है और यह ऊँचे स्तर पर बनी हुई है। समिति का लक्ष्य दीर्घकाल में अधिकतम रोजगार और 2% महंगाई दर हासिल करना है। आर्थिक परिदृश्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है और समिति मानती है कि रोजगार पर जोखिम बढ़ गया है।”

अमेरिका में बढ़ी बेरोजगारी और महंगाई
अमेरिका में बेरोजगारी लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। अमेरिकी श्रम विभाग के अनुसार, अगस्त 2025 में बेरोजगारी दर 4.3% तक पहुँच गई, जो 2021 के बाद सबसे अधिक है। यह आंकड़ा अनुमान से भी ज्यादा रहा। दूसरी ओर, खुदरा महंगाई भी बढ़कर 2.9% सालाना पर पहुँच गई है। जुलाई में यह 2.7% थी। गैसोलीन, किराने का सामान, होटल रूम, हवाई यात्रा, कपड़े और सेकेंड-हैंड कारों की कीमतों में बढ़ोतरी ने अगस्त में महंगाई को और तेज़ किया। यह जनवरी के बाद से सबसे ऊँचा स्तर है। ऐसे में फेडरल रिज़र्व पर दबाव था कि वह ब्याज दरों में कटौती कर अर्थव्यवस्था को राहत दे।
भारत में भी गिरी रेपो दर, अक्टूबर में अगली बैठक
गौरतलब है कि भारत का रिज़र्व बैंक (RBI) भी इस साल अब तक कुल 1.00% की रेपो दर में कटौती कर चुका है। फरवरी 2025 में 0.25% घटाकर रेपो दर 6.50% से 6.25% की गई, अप्रैल में फिर 0.25% घटाकर 6.00% कर दी गई और जून में सीधे 0.50% की बड़ी कटौती कर रेपो दर 5.50% तक लाई गई। अगस्त की मौद्रिक नीति समिति (MPC) बैठक में रेपो दर को यथावत रखा गया। अब अक्टूबर में होने वाली अगली एमपीसी बैठक में फिर से ब्याज दरों की समीक्षा होगी। इस तरह अमेरिका और भारत दोनों ही केंद्रीय बैंक अपने-अपने देशों की बेरोजगारी और महंगाई से निपटने के लिए ब्याज दरों में कटौती कर रहे हैं।







