मुंबई की लोकल ट्रेनों में 11 जुलाई 2006 को हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे देश को दहला दिया था। इस हमले में 189 लोगों की जान गई और 824 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। अब, करीब 18 साल बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस केस में फैसला सुनाते हुए सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया है। यह फैसला न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति एस. जी. चंदक की खंडपीठ ने दिया है। इनमें से एक आरोपी की मृत्यु 2022 में जेल में हो गई थी, जबकि शेष 11 को बरी कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने सबूतों को बताया अविश्वसनीय
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष इस मामले को “बियॉन्ड रीजनेबल डाउट” यानी शक की कोई गुंजाइश न हो, इस स्तर पर साबित करने में असफल रहा। गवाहों के बयानों को भी अविश्वसनीय करार दिया गया। कोर्ट ने सवाल उठाया कि आखिर कोई टैक्सी चालक या यात्री, घटना के 100 दिन बाद तक कैसे किसी व्यक्ति को पहचान सकता है? कोर्ट ने बरामद बम, नक्शे और हथियारों को भी मामले में अप्रासंगिक माना।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और अपील की मांग
इस फैसले पर राजनीतिक हलकों से भी तीखी प्रतिक्रियाएं आईं। बीजेपी नेता किरीट सोमैया ने इसे “दुखद और चौंकाने वाला” करार दिया। उन्होंने मुख्यमंत्री से अपील की कि इस मामले की फिर से जांच हो और यह मामला सुप्रीम कोर्ट में ले जाया जाए। उनका मानना है कि मुम्बईवासियों को इंसाफ मिलना चाहिए और दोषियों को सजा होनी चाहिए।
लंबी कानूनी प्रक्रिया और देरी के कारण
इस केस की सुनवाई 2015 में शुरू हुई थी जब राज्य सरकार ने दोषियों की मौत की सजा की पुष्टि के लिए याचिका दाखिल की थी। उसी समय आरोपियों ने भी सजा के खिलाफ अपील की थी। करीब 11 सालों में 11 बार बेंच बदली गई, और अंततः जुलाई 2024 में एक विशेष पीठ का गठन हुआ। सुनवाई पूरी होने के बाद जनवरी 2025 में फैसला सुरक्षित रखा गया था।
जांच एजेंसियों की साख पर सवाल
हाईकोर्ट के फैसले ने न केवल अभियोजन की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि जांच एजेंसियों की निष्पक्षता और दक्षता पर भी गंभीर चिंताएं जताई हैं। बचाव पक्ष ने आरोप लगाया था कि MCOCA कानून के तहत लिए गए कबूलनामे जबरदस्ती और यातना के तहत लिए गए थे, जिसे कोर्ट ने संज्ञान में लिया। यह फैसला न केवल एक कानूनी मोड़ है, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था में निष्पक्षता की नई बहस को भी जन्म देता है।







