सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि यात्रियों को अधूरी, गड्ढों से भरी और जाम से पस्त हाईवे पर टोल टैक्स देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश भुशन आर. गवई की अध्यक्षता वाली बेंच ने एनएचएआई और कंसेंशनेयर की अपील खारिज करते हुए कहा कि नागरिकों के हित को आर्थिक नुकसान से ऊपर रखा जाएगा। यह फैसला केरल हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखता है, जिसमें त्रिशूर जिले के पालयेक्कारा प्लाजा पर टोल वसूली पर रोक लगाई गई थी।
“नागरिकों को नालों और गड्ढों के लिए टैक्स क्यों दें?”
सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के 6 अगस्त के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि नागरिक पहले ही टैक्स दे चुके हैं। उन्हें अब गड्ढों और अधूरी सड़कों से गुजरने के लिए अतिरिक्त पैसे क्यों देने चाहिए? कोर्ट ने तीखे शब्दों में कहा कि ऐसी सड़कों पर टोल वसूली अक्षमता का प्रतीक है और नागरिकों के भरोसे के साथ धोखा है।

हाईवे का जाम बना टोल सिस्टम पर सवाल
एनएचएआई की दलील थी कि ट्रैफिक जाम केवल “ब्लैक स्पॉट्स” पर है, जहां अंडरपास का निर्माण हो रहा है। लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि 65 किलोमीटर के हाईवे पर अगर केवल 5 किलोमीटर का हिस्सा भी प्रभावित हो तो इसका असर पूरे रास्ते पर पड़ता है। पिछले हफ्ते इसी कारण एदप्पल्ली-मनुथी सेक्शन पर 12 घंटे तक ट्रैफिक ठप रहा। कोर्ट ने पूछा – “अगर 12 घंटे में वही रास्ता तय करना है, तो 150 रुपये टोल क्यों दिया जाए?”
“रोज़ का 49 लाख का नुकसान” – NHAI
एनएचएआई की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और कंसेंशनेयर की ओर से वरिष्ठ वकील श्याम दिवान ने दलील दी कि टोल वसूली बंद होने से रोज़ करीब 49 लाख रुपये का नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि यह राजस्व सड़क नेटवर्क की देखभाल और सुधार के लिए ज़रूरी है। लेकिन कोर्ट ने साफ कर दिया कि जनता से पैसे तभी लिए जा सकते हैं, जब बदले में उन्हें सुविधाजनक और सुरक्षित सड़क मिले।
नागरिकों की जीत, व्यवस्था पर सवाल
इस फैसले को लोगों की बड़ी जीत माना जा रहा है। यह न केवल नागरिकों की जेब को राहत देगा बल्कि सड़क निर्माण एजेंसियों को जवाबदेह भी बनाएगा। कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि जनता का पैसा बर्बाद नहीं किया जा सकता और अगर सड़कें अधूरी हैं तो टोल टैक्स का कोई औचित्य नहीं है। यह आदेश भविष्य में देशभर में टोल वसूली को लेकर नई बहस छेड़ सकता है।







