उत्तर प्रदेश को बांटने की मांग एक बार फिर से राजनीतिक और सामाजिक चर्चा में छाई हुई है। खासकर पश्चिमी यूपी और अमेठी क्षेत्रों से इस मांग को जोर-शोर से उठाया जा रहा है। लेकिन भारत में बड़े राज्यों को बांटना कोई नई बात नहीं है। आज हम जानेंगे कि इतिहास में किन किन राज्यों का विभाजन हुआ है और किस वजह से ऐसा हुआ। बड़े राज्यों को बांटने का मुख्य कारण प्रशासनिक सुगमता, क्षेत्रीय विकास, सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक मांगें रही हैं। इस परंपरा की शुरुआत 1950 के दशक में भाषा आधारित पुनर्गठन से हुई थी, जिसने देश के नक्शे को पूरी तरह से बदल दिया।
भाषा आधारित पुनर्गठन और पहले बड़े राज्य विभाजन
भारत का पहला बड़ा राज्य विभाजन भाषाई आधार पर हुआ था। 1953 में आंध्र प्रदेश भारत का पहला भाषाई राज्य बना, जो तेलुगू भाषी लोगों के लिए मद्रास प्रेसीडेंसी से अलग किया गया था। इसके बाद 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम आया, जिसने पूरे देश में राज्य सीमाओं को भाषाई और सांस्कृतिक आधार पर पुनः परिभाषित किया। इसी का नतीजा था कि 1960 में बॉम्बे राज्य को मराठी और गुजराती भाषी क्षेत्रों के आधार पर महाराष्ट्र और गुजरात में विभाजित कर दिया गया। यह पुनर्गठन भाषा और संस्कृति के आधार पर राज्यों को बेहतर तरीके से संगठित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
उत्तर भारत में पंजाब का पुनर्गठन और हिमालयी राज्यों का गठन
उत्तर भारत में 1966 में पंजाब का पुनर्गठन हुआ, जो भाषाई और सांस्कृतिक मतभेदों के कारण आवश्यक था। पंजाबी भाषी क्षेत्र पंजाब के रूप में कायम रहा, जबकि हिंदी भाषी क्षेत्रों को हरियाणा राज्य बना दिया गया। साथ ही पहाड़ी इलाकों को अलग करके हिमाचल प्रदेश को 1971 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। इस दौरान चंडीगढ़ को केंद्र शासित प्रदेश के रूप में बनाया गया और यह पंजाब और हरियाणा की साझा राजधानी बनी। यह पुनर्गठन क्षेत्रीय मांगों को मान्यता देने और बेहतर प्रशासन सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा बदलाव था।
पूर्वोत्तर और हाल के बड़े पुनर्गठन
पूर्वोत्तर भारत का बड़ा हिस्सा कभी अविभाजित असम का हिस्सा था। 1963 में नागालैंड बना और 1972 में मेघालय को असम से अलग किया गया। इसके बाद मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश को क्रमशः पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। 2000 में मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड और बिहार से झारखंड को अलग किया गया, जो प्रशासनिक बोझ कम करने और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए था। 2014 में तेलंगाना का आंध्र प्रदेश से अलग होना और 2019 में जम्मू-कश्मीर का दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित होना आधुनिक भारत के सबसे बड़े राज्य पुनर्गठनों में शामिल हैं।
भारत में बड़े राज्यों के विभाजन की परंपरा लगातार विकसित होती रही है और यह प्रशासनिक दक्षता, विकास और क्षेत्रीय सांस्कृतिक पहचान को सशक्त बनाने के लिए जरूरी रहा है। उत्तर प्रदेश की विभाजन मांग भी इसी कड़ी का हिस्सा है। समय के साथ देश के राजनीतिक और सामाजिक हालात को देखते हुए राज्यों का पुनर्गठन होता रहा है ताकि बेहतर शासन और विकास सुनिश्चित किया जा सके। यही वजह है कि राज्यों के बंटवारे की मांगें कभी खत्म नहीं होतीं और यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक अहम प्रक्रिया के रूप में जानी जाती हैं।







