भारत के कई राज्यों पर बढ़ता कर्ज अब सिर्फ बजट की तालिकाओं तक सीमित नहीं रह गया है। इसका सीधा असर राज्यों की विकास योजनाओं, सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों और भविष्य की आर्थिक स्थिरता पर पड़ रहा है। तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तराखंड और झारखंड जैसे राज्य लगातार अपने बढ़ते कर्ज को लेकर चर्चा में बने हुए हैं। कर्ज का दबाव इतना बढ़ चुका है कि कई राज्यों को बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सृजन जैसी योजनाओं के लिए नए सिरे से प्राथमिकताएं तय करनी पड़ रही हैं। सवाल यही है कि कौन से राज्य सबसे ज्यादा कर्ज में डूबे हैं और कौन से राज्य वित्तीय संतुलन बनाए रखने में सफल साबित हो रहे हैं।
किस राज्य पर सबसे ज्यादा कर्ज का बोझ
2025-26 के ताजा आंकड़ों के अनुसार भारतीय राज्यों पर कर्ज का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक और विभिन्न राज्य बजट रिपोर्टों से साफ होता है कि कुछ बड़े राज्यों का कर्ज उनके आर्थिक आकार के मुकाबले खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। खास तौर पर तमिलनाडु और महाराष्ट्र कर्ज के मामले में सबसे आगे हैं। इन दोनों राज्यों पर करीब 1.23 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बताया जा रहा है। इसके अलावा मध्यप्रदेश, कर्नाटक, झारखंड और उत्तराखंड जैसे राज्य भी तेजी से उधारी बढ़ा रहे हैं। यह रुझान 2016-17 के बाद से लगातार देखा जा रहा है। बढ़ता कर्ज सिर्फ वित्तीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि इसका असर विकास कार्यों की रफ्तार और दीर्घकालिक निवेश की क्षमता पर भी पड़ रहा है।
कोविड के बाद बदला कर्ज लेने का तरीका
कोविड महामारी के बाद राज्यों के कर्ज लेने के स्वरूप में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। महामारी के दौरान केंद्र सरकार ने राज्यों को विशेष सहायता के रूप में कई तरह के कर्ज दिए। इनमें जीएसटी मुआवजा और पूंजीगत खर्च के लिए 50 साल की अवधि वाले ब्याज मुक्त ऋण शामिल थे। इस लंबे समय वाले सस्ते कर्ज ने राज्यों को तत्काल राहत दी। वहीं दूसरी ओर वित्तीय संस्थानों, पब्लिक अकाउंट और नेशनल स्मॉल सेविंग्स फंड से मिलने वाला कर्ज धीरे धीरे घटता गया। मौजूदा समय में केवल तीन राज्य और एक केंद्र शासित प्रदेश ही एनएसएसएफ से कर्ज ले रहे हैं। इससे साफ है कि राज्यों की उधारी की संरचना बदल चुकी है और वे केंद्र की योजनाओं और बाजार आधारित कर्ज पर ज्यादा निर्भर हो रहे हैं।
कौन संभल रहा है और कौन फिसल रहा है
2024-25 में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की कुल बाजार उधारी 10.73 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई। यह आंकड़ा 2023-24 में 10.07 लाख करोड़ रुपये था। यानी सालाना आधार पर करीब 6.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। हालांकि सभी राज्यों की स्थिति एक जैसी नहीं है। उत्तर प्रदेश में इस दौरान कर्ज में उल्लेखनीय कमी आई है। यूपी का कर्ज 49,618 करोड़ रुपये से घटकर 45,000 करोड़ रुपये हो गया। बिहार में भी मामूली कमी देखने को मिली है। वहीं उत्तराखंड में कर्ज 6,300 करोड़ से बढ़कर 10,400 करोड़ रुपये हो गया और झारखंड में यह 1,000 करोड़ से बढ़कर 3,500 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। राज्यों ने कर्ज प्रबंधन के लिए लंबे समय वाले बॉन्ड का सहारा लिया है। 2024-25 में कुल 835 बार बॉन्ड जारी किए गए। इनमें से कई बॉन्ड 35 साल की अवधि के हैं। इसका मतलब यह है कि राज्य सरकारें कर्ज का बोझ लंबे समय में फैलाकर वित्तीय स्थिरता बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं। यह रणनीति कितनी सफल होगी, यह आने वाले वर्षों में साफ हो पाएगा।







