महात्मा गांधी और तीन बुद्धिमान बंदरों की जापानी-चीनी सांस्कृतिक जुड़ान की कहानी

By: MPLive Team

On: Saturday, January 31, 2026 2:59 PM

महात्मा गांधी और तीन बुद्धिमान बंदरों की जापानी-चीनी सांस्कृतिक जुड़ान की कहानी
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जब भी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम सुनाई देता है, तो हमारे मन में सादगी, सत्य, अहिंसा के साथ-साथ तीन बंदरों की एक खास तस्वीर भी उभरती है। ये तीन बंदर – बुरा न देखो, बुरा न सुनो और बुरा न बोलो – गांधीजी के जीवन दर्शन और उनके मूल सिद्धांतों के प्रतीक बन चुके हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये तीन बंदर बापू से कैसे जुड़े और उनका इतिहास क्या है? आइए जानते हैं इस रोचक कहानी के बारे में।

तीन बंदरों के नाम और उनका अर्थ

तीनों बंदरों के नाम जापानी भाषा से आए हैं। पहला बंदर ‘मिज़ारू’ अपनी आंखें ढकता है, जिसका अर्थ है “बुरा न देखो।” दूसरा बंदर ‘किकाज़ारू’ अपने कान ढकता है, यानी “बुरा न सुनो।” और तीसरा बंदर ‘इवाज़ारू’ अपना मुंह ढकता है, जिसका अर्थ होता है “बुरा न बोलो।” ये तीनों बंदर मिलकर एक जीवन दर्शन का संदेश देते हैं कि हमें न तो बुराई को देखना चाहिए, न सुनना चाहिए और न ही बोलना चाहिए। गांधीजी के जीवन में ये संदेश इतनी मजबूती से जुड़ा कि ये प्रतीक बन गए और उनके साथ हमेशा के लिए जुड़े रहे।

चीन से महात्मा गांधी तक पहुंचा यह प्रतीक

माना जाता है कि ये तीनों बंदर महात्मा गांधी तक चीन से आए थे। देश-विदेश से लोग अक्सर गांधीजी से सलाह लेने उनके पास आते थे। एक बार चीन से एक प्रतिनिधिमंडल महात्मा गांधी से मिलने भारत आया था। उनकी बातचीत के बाद उन्होंने गांधीजी को एक छोटे से तीन बंदरों का सेट भेंट स्वरूप दिया। प्रतिनिधिमंडल ने मुस्कुराते हुए कहा कि भले ही ये खिलौनों जैसे लगते हों, लेकिन उनके देश में ये बहुत लोकप्रिय और प्रतीकात्मक माने जाते हैं। गांधीजी को यह उपहार इतना पसंद आया कि उन्होंने इसे जीवनभर अपने पास रखा। यहीं से यह तीनों बंदर गांधीजी के साथ जुड़ गए और उनकी सोच का हिस्सा बन गए।

जापान की संस्कृति में तीन बुद्धिमान बंदरों का महत्व

तीनों बंदरों का संबंध केवल चीन तक सीमित नहीं है, बल्कि ये जापान की संस्कृति में भी गहरे पैठे हुए हैं। साल 1617 में जापान के निक्को में तोगोशु श्राइन में इन तीनों बंदरों की आकृतियां बनाई गईं, जो आज भी वहां मौजूद हैं। कहा जाता है कि यह विचार चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस से प्रेरित था और आठवीं शताब्दी में चीन से जापान पहुंचा। उस समय जापान में शिंतो धर्म का प्रभाव था, जहां बंदरों को पवित्र और सम्माननीय माना जाता था। जापान में इन्हें ‘वाइज़ मंकीज़’ यानी बुद्धिमान बंदर कहा जाता है। उनकी सांस्कृतिक महत्ता को देखते हुए यूनेस्को ने निक्को के इस धरोहर स्थल को विश्व धरोहर सूची में भी शामिल किया है।

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