जानिए मेडल का इतिहास, और क्यों है गोल्ड-सिल्वर-ब्रॉन्ज का खास मतलब

By: MPLive Team

On: Sunday, February 1, 2026 3:40 PM

जानिए मेडल का इतिहास, और क्यों है गोल्ड-सिल्वर-ब्रॉन्ज का खास मतलब
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आज के समय में खेलों में मेडल जीतना सफलता का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। खिलाड़ी और देश दोनों के लिए मेडल का मतलब होता है मेहनत, लगन और श्रेष्ठता की पहचान। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मेडल देने की यह परंपरा हमेशा से नहीं थी? मेडल वितरण की प्रथा वास्तव में एक आधुनिक अविष्कार है, जिसका इतिहास 19वीं सदी के अंत में फिर से शुरू हुए आधुनिक ओलंपिक खेलों से जुड़ा हुआ है। इस लेख में हम जानेंगे कि खेलों में मेडल देने की परंपरा कैसे शुरू हुई और इसका इतिहास क्या रहा।

मेडल की शुरुआत: एथेंस ओलंपिक 1896

मेडल देने की परंपरा आधिकारिक तौर पर 1896 में एथेंस में आयोजित पहले आधुनिक ओलंपिक खेलों से शुरू हुई। हालांकि, उस समय का मेडल सिस्टम आज के सिस्टम से बिल्कुल अलग था। इस प्रतियोगिता में पहले स्थान पर आने वाले खिलाड़ी को गोल्ड मेडल नहीं बल्कि सिल्वर मेडल, जैतून की टहनी और एक सम्मान पत्र (डिप्लोमा) दिया जाता था। वहीं, दूसरे स्थान पर आए खिलाड़ी को तांबे या कांस्य का मेडल मिलता था। तीसरे स्थान पर आने वाले खिलाड़ियों को कोई पुरस्कार नहीं दिया जाता था। यह प्रणाली बहुत अलग और सरल थी, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण शुरुआत थी जिसने खेलों में विजेताओं को सम्मानित करने की परंपरा को जन्म दिया।

प्राचीन ओलंपिक में विजेताओं का सम्मान

मेडल की परंपरा शुरू होने से पहले, प्राचीन ओलंपिक खेलों में विजेताओं को अलग तरह से सम्मानित किया जाता था। प्राचीन ओलंपिक, जो 776 ईसा पूर्व ग्रीस में शुरू हुए थे, वहाँ विजेताओं को कोई भौतिक पुरस्कार नहीं मिलता था। बल्कि उन्हें जैतून की माला पहनाई जाती थी। यह माला ग्रीक संस्कृति में सम्मान, शांति और दैवीय कृपा का प्रतीक थी। विजेता को सामाजिक प्रतिष्ठा और जीवन भर का सम्मान मिलता था। भौतिक पुरस्कारों की तुलना में यह पहचान और सम्मान अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। इस प्रकार प्राचीन काल में सम्मान की यह प्रणाली काफी अलग थी, लेकिन इसका प्रभाव आज भी मेडल की परंपरा में दिखता है।

गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल सिस्टम की स्थापना

आज जिस तरह से गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल दिए जाते हैं, उसका फॉर्मेट पहली बार 1904 के सेंट लुइस ओलंपिक में अमेरिका में स्थायी रूप से लागू हुआ। इस तीन-स्तरीय मेडल वितरण प्रणाली ने पूरी दुनिया में मान्यता प्राप्त की और यह एक मानक बन गया। बाद में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने 1896 और 1900 के खेलों के विजेताओं को भी गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल से सम्मानित किया। आधुनिक ओलंपिक मेडल की परंपरा का श्रेय फ्रांसीसी शिक्षक पियरे डी कूबर्टिन को जाता है, जिन्होंने ओलंपिक खेलों को पुनः स्थापित किया था। साथ ही, पहले ओलंपिक मेडल प्रसिद्ध फ्रांसीसी मूर्तिकार जुल्स क्लेमेंट चैपलिन ने डिजाइन किए थे।

इन धातुओं का चयन कोई संयोग नहीं था। ग्रीक पौराणिक कथाओं के अनुसार, स्वर्ण, रजत और कांस्य क्रम में इंसान के युगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। स्वर्ण युग शांति और पूर्णता का प्रतीक है, रजत युग गिरावट का और कांस्य युग संघर्ष का। इस प्रकार मेडल केवल पुरस्कार नहीं, बल्कि मानव इतिहास और आदर्शों का भी प्रतीक बन गए। आज यह परंपरा खेलों की सबसे प्रतिष्ठित परंपराओं में से एक है, जो खिलाड़ियों को उनकी कड़ी मेहनत और कौशल के लिए मान्यता देती है।

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