NATO यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन को अक्सर पश्चिमी देशों का सैन्य गठबंधन माना जाता है। इसकी स्थापना साल 1949 में हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य अपने सदस्य देशों की सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है। NATO के नियमों के अनुसार अगर किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है तो उसे सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है। वर्तमान समय में NATO में कुल 31 देश शामिल हैं। आम धारणा यह है कि NATO केवल यूरोप और अमेरिका तक सीमित है लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल है। इस संगठन में कुछ ऐसे देश भी शामिल हैं जहां मुस्लिम आबादी बड़ी संख्या में मौजूद है। यही वजह है कि NATO को लेकर मुस्लिम देशों और खासतौर पर ईरान के साथ इसके संबंधों पर सवाल उठते रहते हैं।
NATO में मुस्लिम आबादी वाले देश कितने हैं
NATO में फिलहाल तीन ऐसे देश हैं जहां मुस्लिम आबादी बड़ी या प्रभावशाली मानी जाती है। इनमें सबसे अहम नाम तुर्की का है। इसके अलावा अल्बानिया और नॉर्थ मैसेडोनिया भी NATO के सदस्य हैं। तुर्की एक मुस्लिम बहुल देश है और NATO में उसकी भूमिका काफी मजबूत मानी जाती है। अल्बानिया में भी मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक है हालांकि वहां की राजनीति और विदेश नीति पूरी तरह पश्चिमी ढांचे पर आधारित है। नॉर्थ मैसेडोनिया में मुस्लिम आबादी अल्पसंख्यक है लेकिन सामाजिक और राजनीतिक रूप से उसका प्रभाव नजर आता है। इसके अलावा बोस्निया एंड हर्जेगोविना जैसे देश NATO के पार्टनर हैं जहां मुस्लिम समुदाय बड़ी संख्या में है लेकिन वे अभी पूर्ण सदस्य नहीं हैं।
तुर्की सबसे ताकतवर मुस्लिम देश और ईरान से रिश्ते
NATO में शामिल मुस्लिम बहुल देशों में तुर्की को सबसे ताकतवर माना जाता है। तुर्की साल 1952 से NATO का सदस्य है। इसकी भौगोलिक स्थिति इसे बेहद रणनीतिक बनाती है क्योंकि यह यूरोप और एशिया के बीच स्थित है। NATO के कई अहम सैन्य अड्डे तुर्की में मौजूद हैं। अगर ईरान की बात करें तो तुर्की और ईरान के रिश्ते न तो पूरी तरह दोस्ताना हैं और न ही खुले तौर पर दुश्मनी वाले। सीरिया और इराक जैसे क्षेत्रीय मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद रहे हैं। इसके बावजूद व्यापार और कूटनीतिक बातचीत लगातार जारी रहती है। वहीं अल्बानिया के ईरान के साथ रिश्ते काफी खराब माने जाते हैं। हाल के वर्षों में अल्बानिया ने ईरान पर साइबर हमलों का आरोप लगाया और ईरानी राजनयिकों को देश से बाहर भी कर दिया। नॉर्थ मैसेडोनिया के ईरान के साथ संबंध सीमित और लगभग तटस्थ माने जाते हैं।
ईरान NATO से बाहर क्यों और मुस्लिम देशों का अलग रुख
ईरान न तो NATO का सदस्य है और न ही उसका आधिकारिक साझेदार। इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच दशकों से चला आ रहा तनाव है। चूंकि अमेरिका NATO का सबसे ताकतवर और प्रभावशाली सदस्य है इसलिए ईरान का NATO में शामिल होना लगभग नामुमकिन माना जाता है। ईरान NATO को एक पश्चिमी सैन्य गठबंधन के रूप में देखता है जो उसके क्षेत्रीय हितों के खिलाफ काम करता है। अगर NATO में शामिल मुस्लिम देशों और ईरान के रिश्तों को देखें तो कोई एक जैसी तस्वीर सामने नहीं आती। तुर्की के साथ रिश्ते जटिल हैं। अल्बानिया खुला विरोधी माना जाता है। नॉर्थ मैसेडोनिया और अन्य यूरोपीय मुस्लिम आबादी वाले इलाकों का ईरान से सीधा टकराव नहीं है। कुल मिलाकर NATO का मुस्लिम चेहरा एक जैसा नहीं है और हर देश अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर ईरान से रिश्ते तय करता है।







