जब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका किसी देश पर टैरिफ बढ़ाती है, तो इसका असर सिर्फ सरकारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आम लोगों की जेब तक पहुंचता है। साल 2025 में अमेरिका ने अपनी आयात शुल्क नीति में बड़े बदलाव किए हैं, जिसने वैश्विक व्यापार जगत में हलचल मचा दी है। अमेरिका ने लगभग सभी देशों के लिए न्यूनतम 10 प्रतिशत बेसलाइन टैरिफ तय कर दिया है। यानी अब अमेरिका को निर्यात होने वाला हर सामान कम से कम 10 प्रतिशत आयात शुल्क के दायरे में आएगा। हालांकि कई देशों के लिए यह दर इससे कहीं ज्यादा रखी गई है। इसी वजह से अब यह सवाल चर्चा में है कि किस देश पर अमेरिका ने सबसे ज्यादा टैरिफ लगाया है और इस पूरी सूची में भारत की स्थिति आखिर कहां खड़ी है।
अगर भारत की तुलना उन देशों से की जाए जिन पर अमेरिका ने कम टैरिफ लगाया है, तो तस्वीर और साफ हो जाती है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं की बात करें तो यूरोपीय यूनियन, जापान और स्विट्जरलैंड पर करीब 15 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया है। यूनाइटेड किंगडम को सबसे ज्यादा राहत मिली है, जहां अमेरिकी टैरिफ सिर्फ 10 प्रतिशत रखा गया है। भारत के लिए यह दर घटाकर 18 प्रतिशत कर दी गई है, जो पहले के मुकाबले कम मानी जा रही है। दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया में वियतनाम और बांग्लादेश पर 20 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया है, जबकि पाकिस्तान, मलेशिया, कंबोडिया, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे देशों पर करीब 19 प्रतिशत शुल्क तय किया गया है। इससे साफ है कि भारत इस क्षेत्र में औसत से थोड़ा बेहतर स्थिति में है।
अब अगर उन देशों की बात करें जिन पर भारत से ज्यादा अमेरिकी टैरिफ लगाया गया है, तो सूची काफी चौंकाने वाली है। इस लिस्ट में सबसे ऊपर ब्राजील है, जहां अमेरिकी आयात शुल्क 50 प्रतिशत तक पहुंच गया है। चीन पर 37 प्रतिशत का भारी-भरकम टैरिफ लगाया गया है, जबकि लाओस और म्यांमार जैसे देशों पर 40 प्रतिशत तक शुल्क तय किया गया है। दक्षिण अफ्रीका पर 30 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया पर करीब 25 प्रतिशत टैरिफ लागू है। ये आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि अमेरिका कुछ देशों के साथ व्यापारिक रिश्तों में बेहद सख्त रुख अपना रहा है। भारत की तुलना में इन देशों को अमेरिकी बाजार में कहीं ज्यादा महंगे दामों पर अपने उत्पाद बेचने पड़ रहे हैं।
अगर पूरी सूची को देखें, तो भारत अब उन देशों में शामिल है जिन पर मध्यम स्तर का अमेरिकी टैरिफ लागू है। 18 प्रतिशत टैरिफ का मतलब यह है कि भारतीय उत्पाद अब अमेरिकी बाजार में पहले की तुलना में थोड़े सस्ते होंगे। यह भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापारिक बातचीत और संतुलन बनाने की कोशिशों का संकेत भी देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका टैरिफ बढ़ाकर अपने घरेलू उद्योगों को बचाने की कोशिश करता है। इसके जरिए वह दूसरे देशों पर दबाव बनाता है कि वे अपनी व्यापार नीतियों में बदलाव करें। हालांकि लंबे समय में ऊंचे टैरिफ वैश्विक व्यापार को महंगा बनाते हैं और देशों के बीच तनाव भी बढ़ा सकते हैं। भारत के लिए फिलहाल राहत की बात यह है कि वह सबसे ज्यादा टैरिफ झेलने वाले देशों की सूची में नहीं है, लेकिन वैश्विक व्यापार की यह जंग आगे और तेज हो सकती है।







