भारत में मौत की सजा पर नई रिपोर्ट ने उठाए न्यायिक प्रक्रिया के गंभीर सवाल

By: MPLive Team

On: Wednesday, February 4, 2026 6:00 PM

भारत में मौत की सजा पर नई रिपोर्ट ने उठाए न्यायिक प्रक्रिया के गंभीर सवाल
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हैदराबाद स्थित हिमालयन नलसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के स्क्वायर सर्किल क्लीनिक ने भारत में मृत्युदंड की न्यायिक प्रक्रिया पर एक नई रिपोर्ट जारी की है, जिसने इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस रिपोर्ट में पिछले दस सालों (2016 से 2025) के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है, जिसमें ट्रायल कोर्ट लेवल पर भारी संख्या में फांसी की सजा सुनाई गई, लेकिन ऊपरी अदालतों में इन सजा फैसलों को टिकते कम देखा गया। रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में ट्रायल कोर्ट्स ने कुल 1,310 लोगों को मौत की सजा सुनाई, लेकिन हाई कोर्ट में केवल 70 मामलों में ही फांसी की सजा बरकरार रखी गई। यह आंकड़ा कुल सजा की तुलना में अत्यंत कम है, जिससे यह संकेत मिलता है कि ट्रायल कोर्ट के निर्णयों की समीक्षा में न्यायालय उच्च स्तर पर कड़ी सतर्कता बरत रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने नहीं दी किसी भी फांसी को मंजूरी

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि हाई कोर्ट द्वारा पुष्टि किए गए 70 मामलों में से सुप्रीम कोर्ट ने केवल 38 मामलों पर फैसला दिया, और इनमें से किसी भी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड को सही नहीं ठहराया। लगातार तीसरे वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा की पुष्टि नहीं की है, जबकि बरी किए जाने वाले मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वहीं, 31 दिसंबर तक देश में 574 कैदी डेथ रो में बंद थे, जो 2016 के बाद किसी भी वर्ष के अंत में सबसे अधिक संख्या है। यह स्थिति तब उत्पन्न हुई है जब अपीलीय अदालतें ट्रायल कोर्ट के फैसलों को बड़ी संख्या में पलट रही हैं या सजा को कम कर रही हैं। इसका मतलब साफ है कि निचली अदालतों में दोषसिद्धि की प्रक्रिया में गंभीर त्रुटियां हो रही हैं।

2025 में भी जारी रहा न्यायिक सतर्कता का यही ट्रेंड

2025 के आंकड़े भी इसी प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। इस वर्ष सेशंस कोर्ट्स ने 94 मामलों में 128 लोगों को मृत्युदंड सुनाया, जबकि हाई कोर्ट ने निपटाए गए मामलों में लगभग 90 फीसदी मामलों में या तो सजा रद्द कर दी, उम्रकैद की सजा दी या फिर मामले को पुनः ट्रायल के लिए भेज दिया। यह रिपोर्ट यह संकेत देती है कि ट्रायल कोर्ट पर दोषसिद्धि की प्रक्रिया अक्सर त्रुटिपूर्ण, अनुचित या गलत साबित हो रही है। इसे महज कुछ मामलों की गलती मान कर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर मामलों की समीक्षा में गलतियां पाई गई हैं, जो न्याय व्यवस्था की साख पर प्रश्न चिह्न लगाती हैं।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना और नई चिंताएं

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2025 में ट्रायल कोर्ट्स ने सुप्रीम कोर्ट के 2022 में जारी किए गए दिशा निर्देशों का बड़े पैमाने पर पालन नहीं किया। इन निर्देशों के अनुसार, फांसी की सजा देने से पहले आरोपी की मानसिक स्थिति, प्रोबेशन रिपोर्ट और जेल रिकॉर्ड का गहन परीक्षण आवश्यक है, लेकिन 83 में से 79 मामलों में इस नियम का उल्लंघन हुआ। रिपोर्ट यह भी बताती है कि जहां ऊपरी अदालतें मृत्युदंड के मामलों में अधिक सतर्क और विवेकशील होती जा रही हैं, वहीं संसद और राज्य विधानसभा नए कानून बना रही हैं जो मृत्युदंड के दायरे को बढ़ा रहे हैं। साथ ही, उम्रकैद की सजाओं की संख्या बढ़ रही है, जिनमें रिहाई की संभावना न के बराबर होती है, जिससे यह न्याय व्यवस्था के लिए एक नई और चिंताजनक समस्या बन गई है।

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