देश में इन दिनों Places of Worship Act, 1991 एक बार फिर केंद्र में है। बुधवार 18 दिसंबर को इस कानून पर Supreme Court of India में सुनवाई हुई। यह कानून धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों को लेकर बेहद संवेदनशील माना जाता है। अदालत में इस पर बहस होते ही राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गईं। सवाल यह है कि यह कानून आखिर कहता क्या है और इसे लागू करने के पीछे सरकार की मंशा क्या थी। यह अधिनियम 1991 में तब लाया गया था जब देश में धार्मिक स्थलों को लेकर माहौल बेहद तनावपूर्ण था और कई स्थानों पर विवाद गहराने लगे थे।
कानून के मुख्य प्रावधान क्या कहते हैं
इस अधिनियम के अनुसार 15 अगस्त 1947 से पहले जिस भी धार्मिक स्थल का जो स्वरूप था उसे बदला नहीं जा सकता। यानी किसी भी धर्म का पूजा स्थल किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में परिवर्तित नहीं किया जा सकता। कानून का उल्लंघन करने पर तीन साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। सेक्शन 2 साफ कहता है कि 15 अगस्त 1947 को जिस धार्मिक स्थल का जो स्वरूप था उसे बदलने से जुड़ी कोई भी याचिका यदि अदालत में लंबित है तो वह स्वतः समाप्त मानी जाएगी। सेक्शन 3 किसी भी धार्मिक स्थल को पूर्ण या आंशिक रूप से किसी अन्य धर्म या उसी धर्म के किसी अन्य संप्रदाय में बदलने पर रोक लगाता है। सेक्शन 4(1) में कहा गया है कि 15 अगस्त 1947 को मौजूद धार्मिक चरित्र को बनाए रखना अनिवार्य होगा। वहीं सेक्शन 4(2) के तहत कानून लागू होने के समय लंबित सभी मुकदमों और कानूनी कार्यवाहियों पर रोक लगा दी गई थी।
राम जन्मभूमि को क्यों रखा गया बाहर और सरकार की मंशा क्या थी
इस कानून का एक अहम अपवाद सेक्शन 5 में दिया गया है। इसके तहत Ram Janmabhoomi-Babri Masjid विवाद को इस अधिनियम के दायरे से बाहर रखा गया। यानी अयोध्या मामले पर यह कानून लागू नहीं हुआ। दरअसल यह कानून उस दौर में लाया गया था जब राम मंदिर आंदोलन चरम पर था और देश के कई हिस्सों में अन्य मंदिरों और मस्जिदों को लेकर भी विवाद उभरने लगे थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री P V Narasimha Rao की सरकार ने हालात को काबू में रखने और देश में सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए यह कानून बनाया। मकसद साफ था कि आजादी के समय जो धार्मिक स्थिति थी उसे स्थायी रूप से स्वीकार कर आगे किसी नए विवाद को जन्म न लेने दिया जाए।
सजा का प्रावधान और मौजूदा बहस का महत्व
Places of Worship Act सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होता है। इसके उल्लंघन पर अधिकतम तीन साल की जेल और जुर्माने की सजा तय की गई है। मौजूदा समय में इस कानून को लेकर बहस इसलिए अहम हो गई है क्योंकि कुछ याचिकाओं में इसके संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। समर्थकों का कहना है कि यह कानून देश की एकता और शांति के लिए जरूरी है। वहीं विरोधियों का तर्क है कि इससे ऐतिहासिक तथ्यों की न्यायिक जांच का रास्ता बंद हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई से यह तय हो सकता है कि यह कानून भविष्य में किस तरह लागू रहेगा और धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में अदालतों की भूमिका क्या होगी।







