क्या दिल्ली को फिर से प्राचीन नाम इंद्रप्रस्थ मिलेगा, जानें इतिहास और प्रस्ताव का सच

By: MPLive Team

On: Thursday, February 26, 2026 5:30 PM

क्या दिल्ली को फिर से प्राचीन नाम इंद्रप्रस्थ मिलेगा, जानें इतिहास और प्रस्ताव का सच
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हाल ही में केरल का नाम ऑफीशियली ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद भारत में राज्यों और शहरों के नाम बदलने की राजनीतिक चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है। इसी कड़ी में अब दिल्ली के नाम को लेकर भी नई मांग उठाई जा रही है। बीजेपी सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को चिट्ठी लिखकर दिल्ली का नाम बदलकर ‘इंद्रप्रस्थ’ करने का प्रस्ताव दिया है। उनका कहना है कि यह कदम भारत की प्राचीन सांस्कृतिक और सभ्यता की जड़ों को उजागर करेगा और औपनिवेशिक प्रभाव वाले वर्तमान नाम को बदलने में मदद करेगा।

इंद्रप्रस्थ और महाभारत काल से कनेक्शन

खंडेलवाल के अनुसार, महाभारत में इंद्रप्रस्थ का बहुत महत्व है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, पांडवों ने खांडवप्रस्थ जंगल को साफ करने के बाद यह राजधानी बसाई थी। कई इतिहासकार और पुरातत्वविद मानते हैं कि आज की दिल्ली इस प्राचीन इंद्रप्रस्थ के भौगोलिक इलाके से मेल खाती है। पुरानी खुदाई में मिली कलाकृतियां और मलबे के अवशेष यह दर्शाते हैं कि यहां हजारों सालों से मानव बस्तियां रही हैं। हालांकि, सीधे आज की दिल्ली को इंद्रप्रस्थ से जोड़ने वाली पक्की ऐतिहासिक पुष्टि आज भी विवादों का विषय बनी हुई है।

दिल्ली के नाम का ऐतिहासिक विकास

दिल्ली का नाम समय के साथ कई बार बदला गया है और अलग-अलग शासकों ने इसे नई पहचान दी। ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि दिल्ली को कई बार बसाया, तोड़ा और पुनर्निर्मित किया गया। दिल्ली से जुड़े प्रमुख नामों में इंद्रप्रस्थ, दिल्लिका, दहली, तुगलकाबाद, शाहजहांाबाद और नई दिल्ली शामिल हैं। वर्तमान में ‘दिल्ली’ नाम सबसे ज्यादा प्रचलित और ऑफिशियल मान लिया गया है। यह नाम शहर की लंबी और विविध ऐतिहासिक यात्रा को दर्शाता है।

भारत में नाम बदलने के अन्य उदाहरण

देश में कई शहरों के नाम बदलकर उनकी प्राचीन या स्थानीय पहचान को लौटाया गया है। बॉम्बे का नाम बदलकर मुंबई किया गया, कलकत्ता अब कोलकाता कहलाता है, मद्रास को चेन्नई बनाया गया और इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया गया। प्रवीण खंडेलवाल का प्रस्ताव इसी सिलसिले को आगे बढ़ाने वाला माना जा रहा है। इस प्रस्ताव के समर्थन और विरोध में राजनीतिक और ऐतिहासिक बहसें शुरू हो गई हैं, और अब देखना यह है कि सरकार इस पर क्या निर्णय लेती है।

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