मिडिल ईस्ट में इस समय युद्ध की स्थिति लगातार बढ़ती जा रही है। अमेरिका और इजरायल की ईरान पर सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान ने कई अरब देशों पर मिसाइलें दागी हैं। इससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल गई है। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबर ने हालात और जटिल कर दिए हैं। शिया समुदाय ने कई देशों में सड़कों पर प्रदर्शन किया, जबकि सुन्नी बहुल देशों की सरकार ने इसे ईरान का अंदरूनी मामला बताया।
शिया और सुन्नी में विभाजन की शुरुआत
शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच का विभाजन करीब 1400 साल पहले पैगंबर हजरत मोहम्मद के निधन के बाद शुरू हुआ। पैगंबर के मरने के बाद नेतृत्व को लेकर मतभेद पैदा हो गया। एक समूह ने अबू बकर को पहला खलीफा मानने की वकालत की, जबकि दूसरा समूह हजरत अली को पैगंबर का असली उत्तराधिकारी मानता था। इसी विवाद से मुसलमान दो हिस्सों में बंट गए। शुरुआत में यह राजनीतिक विवाद था, लेकिन समय के साथ यह धार्मिक पहचान का हिस्सा बन गया।
सुन्नी मुसलमान और उनका प्रभाव
सुन्नी मुसलमान दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी हैं। कुल मुसलमानों में लगभग 85 प्रतिशत लोग सुन्नी हैं। वे मानते हैं कि पैगंबर के बाद नेतृत्व अबू बकर को मिलना चाहिए था। आज सुन्नी बहुल देशों में सऊदी अरब, तुर्की, मिस्र, पाकिस्तान, इंडोनेशिया और बांग्लादेश शामिल हैं। सुन्नी देशों की राजनीतिक और सैन्य ताकत वैश्विक स्तर पर काफी मजबूत मानी जाती है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इन देशों का प्रभाव काफी बड़ा है।
शिया मुसलमान और उनकी प्रमुख स्थितियां
शिया मुसलमान कुल मुस्लिम आबादी का लगभग 15 प्रतिशत हैं। ये लोग मानते हैं कि पैगंबर मोहम्मद के बाद नेतृत्व उनके दामाद हजरत अली को मिलना चाहिए था। शिया समुदाय में धार्मिक नेताओं और विशेष रूप से अयातुल्लाह को काफी महत्व दिया जाता है। ईरान दुनिया का सबसे बड़ा शिया बहुल देश है, जहां करीब 90 प्रतिशत शिया रहते हैं। इसके अलावा इराक, लेबनान, बहरीन और अजरबैजान में भी शिया आबादी काफी संख्या में है। शिया-सुन्नी विवाद आज भी मिडिल ईस्ट की राजनीति और सुरक्षा स्थिति को प्रभावित करता है।







