भारत के राष्ट्रपति का पद देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद है और उनके किसी राज्य में आगमन पर स्वागत की प्रक्रिया बेहद सख्त होती है. शनिवार, 7 मार्च 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के पश्चिम बंगाल दौरे में मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति ने इस प्रोटोकॉल पर नई बहस खड़ी कर दी. राष्ट्रपति की अगवानी केवल औपचारिकता नहीं बल्कि ‘वॉरंट ऑफ प्रेसिडेंस’ के तहत अनिवार्य प्रक्रिया है. यह नियम न केवल पद की गरिमा दर्शाता है बल्कि केंद्र और राज्य के बीच संवैधानिक संबंधों की मजबूती का प्रतीक भी है. हर राज्य को राष्ट्रपति के दौरे की पूरी तैयारी पहले से करनी होती है और इसमें किसी भी प्रकार की चूक राजनीतिक और संवैधानिक विवाद का कारण बन सकती है.
अगवानी की कतार में सबसे आगे कौन होता है
जब राष्ट्रपति किसी राज्य की सीमा में प्रवेश करते हैं या हवाई अड्डे पर उतरते हैं, तो स्वागत के लिए गणमान्य व्यक्तियों की सूची पहले से तय होती है. प्रोटोकॉल के अनुसार राज्य के प्रथम नागरिक के रूप में राज्यपाल का वहां उपस्थित होना अनिवार्य है. उनके ठीक बाद मुख्यमंत्री का स्थान होता है. मुख्यमंत्री की उपस्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे राज्य सरकार और जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं. यदि मुख्यमंत्री अनुपस्थित रहते हैं तो केवल वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री उनकी जगह ले सकते हैं. जिला प्रशासन या अन्य अधिकारियों का प्रतिनिधित्व निर्वाचित नेताओं की जगह नहीं ले सकता और उनकी गैर-मौजूदगी संवैधानिक शिथिलता के रूप में देखी जाती है.
अधिकारियों और सुरक्षा के प्रमुखों की भूमिका
राज्य के प्रशासनिक और सुरक्षा ढांचे का प्रतिनिधित्व करने वाले शीर्ष अधिकारी राष्ट्रपति के स्वागत में शामिल होते हैं. राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक कार्यक्रम की सफलता और सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालते हैं. हवाई अड्डे पर स्थानीय महापौर और सैन्य क्षेत्रों में सैन्य कमांडर भी स्वागत के लिए मौजूद रहते हैं. सुरक्षा के लिए वाहनों का काफिला और उनके मार्ग का पूरा प्रबंध राज्य पुलिस और खुफिया विभाग करते हैं. राष्ट्रपति के दौरे के दौरान किसी भी प्रकार की चूक संवैधानिक गरिमा पर सवाल खड़ा कर सकती है.
शिष्टाचार और राज्य सरकार की जिम्मेदारी
राष्ट्रपति का स्वागत करते समय शिष्टाचार के कड़े नियम होते हैं. राष्ट्रपति से हाथ मिलाना या उनके पैर छूना अनुशासनहीनता माना जाता है. अभिवादन केवल हाथ जोड़कर और हल्का झुककर किया जाता है. राष्ट्रपति के प्रवास के दौरान सुरक्षा और रहने की व्यवस्था पूरी तरह राज्य सरकार के अधीन होती है. चाहे वे राजभवन में ठहरें या किसी अन्य कार्यक्रम स्थल पर, सुरक्षा के वही मानक लागू होते हैं जो राष्ट्रपति भवन में होते हैं. किसी भी प्रकार की लापरवाही को संवैधानिक अपमान माना जाता है और राज्य सरकार को इसके लिए पूरी जिम्मेदारी उठानी होती है.







