WhatsApp ने अब 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए नया पैरेंट-मैनेज्ड अकाउंट फीचर लॉन्च किया है। इसके तहत बच्चे के अकाउंट को पैरेंट्स अपने डिवाइस से लिंक कर सकते हैं। इस फीचर का मुख्य उद्देश्य बच्चों की बातचीत और मैसेजिंग पर पैरेंट्स की निगरानी रखना है। जबकि कई देशों में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंधित किया जा रहा है, WhatsApp इस उम्र के बच्चों को डिजिटल दुनिया से जोड़ने की कोशिश कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रहना सीखने में मदद मिल सकती है, लेकिन इसके साथ कई सावधानियां भी जरूरी हैं।
पैरेंटल कंट्रोल के बावजूद डिजिटल खतरे
मैक्योर हॉस्पिटल के आईटी मैनेजर प्रबीर जना का कहना है कि पैरेंटल कंट्रोल से बच्चों का एक्सपोजर कम होता है, लेकिन यह पूरी सुरक्षा नहीं देता। आजकल चैट्स एंड-टू-एंड एनक्रिप्टेड होती हैं, जिससे बच्चों की बातचीत को डिटेक्ट करना मुश्किल हो जाता है। इसके कारण स्कैम और फ्रॉड के खतरे बढ़ जाते हैं। बच्चे आसानी से लोगों पर भरोसा कर लेते हैं और कोड या पर्सनल इंफोर्मेशन शेयर कर देते हैं। स्कैमर फेक प्रोफाइल बनाकर बच्चों को पब्लिक ग्रुप्स में टारगेट करते हैं और धीरे-धीरे डायरेक्ट मैसेज के माध्यम से फ्रेंडशिप और फोटो-वीडियो की मांग करते हैं। पैरेंट्स को चाहिए कि बच्चों को हमेशा इस तरह के खतरे समझाएं और किसी के साथ कोड या निजी जानकारी शेयर न करने की सलाह दें।
PSRI हॉस्पिटल की साइकोलॉजिस्ट अर्पिता कोहली बताती हैं कि बच्चों की सोशल और इमोशनल ग्रोथ पर सोशल मीडिया का असर पड़ता है। छोटे बच्चों में फेस-टू-फेस बातचीत कम हो जाती है, जिससे उनकी इमोशन समझने और सोशल स्किल्स विकसित करने की क्षमता प्रभावित होती है। व्हाट्सएप का पैरेंट-मैनेज्ड अकाउंट बच्चों को सुरक्षित डिजिटल माहौल देने में मदद कर सकता है, लेकिन अगर स्क्रीन टाइम सीमित नहीं रखा गया तो बच्चे पूरी तरह डिजिटल कम्युनिकेशन पर निर्भर हो सकते हैं। इसलिए पैरेंट्स के लिए जरूरी है कि वे बच्चों के डिजिटल व्यवहार पर नजर रखें और उन्हें ऑनलाइन सुरक्षित और जिम्मेदार रहना सिखाएं।
पैरेंट्स के लिए सुरक्षा और निगरानी की सलाह
अर्पिता कोहली के अनुसार पैरेंट्स को बच्चों पर नजर रखने के बजाय खुलकर बातचीत करनी चाहिए। उन्हें बच्चों को ऑनलाइन सेफ्टी के नियम बताने चाहिए और स्क्रीन टाइम के लिए साफ नियम बनाना चाहिए। साथ ही बच्चों को समझाना चाहिए कि कौनसे दोस्त या ऑनलाइन लोग भरोसेमंद हैं। पैरेंटल कंट्रोल से साइबर बुलिंग और डिजिटल खतरों से सुरक्षा मिलती है। यदि बच्चे के व्यवहार में बदलाव, नींद या मूड में अंतर दिखाई दे तो यह वार्निंग साइन हो सकता है। ऐसे में पैरेंट्स को बातचीत कर बच्चे की चिंताओं को समझना चाहिए और उसे सुरक्षित डिजिटल अनुभव प्रदान करना चाहिए।







