4 नवंबर 1979 की तारीख इतिहास में अमेरिका के लिए एक गहरे जख्म की तरह दर्ज हो गई। ईरान में अमेरिकी दूतावास पर उग्र छात्रों के हमले में 52 अमेरिकियों को बंधक बना लिया गया। इस घटना ने अमेरिकी सत्ता और रणनीति की कमजोरी को दुनिया के सामने उजागर कर दिया। आंखों पर पट्टी बांधे गए राजनयिकों की तस्वीरें और उनका अपमानजनक व्यवहार अमेरिका के लिए भारी राजनीतिक और सामाजिक धक्का बन गया। यह सिर्फ एक दूतावास पर हमला नहीं था, बल्कि अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय नीतियों पर भी चुनौती थी।
ईरानी क्रांति और दूतावास पर कब्जा
साल 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति चरम पर थी। शाह मोहम्मद रजा पहलवी को देश छोड़कर भागना पड़ा और सत्ता आयतुल्ला खामेनेई के हाथों में आ गई। अमेरिका द्वारा शाह को शरण देने के बाद ईरानी छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने अमेरिकी दूतावास पर हमला कर दिया। बंधकों को वापस देने की मांग में उन्होंने अमेरिका से शाह को लौटाने और ईरानी संपत्ति जारी करने की शर्त रखी। इस कदम ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका की छवि को चुनौतीपूर्ण बना दिया।
ऑपरेशन ईगल क्लॉ और सैन्य विफलता
बंधकों को छुड़ाने के लिए अमेरिका ने 24 अप्रैल 1980 को ‘ऑपरेशन ईगल क्लॉ’ शुरू किया। योजना थी कि हेलीकॉप्टर और विमान ईरान के रेगिस्तान में उतरें और कमांडो बंधकों को रेस्क्यू करें। लेकिन रेगिस्तानी तूफान और तकनीकी खराबियों ने मिशन को नाकाम कर दिया। एक हेलीकॉप्टर टैंकर विमान से टकरा गया और आठ अमेरिकी सैनिक मारे गए। इस सैन्य असफलता ने ईरानी हौसले बढ़ा दिए और अमेरिका अपनी ताकत के बावजूद अपने नागरिकों को बचाने में पूरी तरह असमर्थ दिखा।
अल्जीयर्स समझौता और 444 दिनों का अंत
बंधकों की रिहाई अंततः कूटनीति से हुई। अल्जीयर्स समझौते के तहत अमेरिका ने ईरान की संपत्ति अनफ्रीज करने और आंतरिक मामलों में दखल न देने पर सहमति दी। 20 जनवरी 1981 को रोनाल्ड रीगन के शपथ ग्रहण के तुरंत बाद 52 बंधकों को रिहा किया गया। यह संकट 444 दिनों तक चला और आधुनिक इतिहास में सबसे लंबा बंधक संकट माना गया। इस घटना ने अमेरिका-ईरान रिश्तों को हमेशा के लिए प्रभावित किया और अमेरिका के लिए भूगोल, खराब इंटेलिजेंस और कूटनीतिक चुनौतियों के कारण यह एक सख्त सबक बन गया।







