जैसे-जैसे ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ रहा है, वैश्विक ईंधन आपूर्ति पर दबाव भी बढ़ गया है। भारत में इसका असर एलपीजी की बढ़ती कीमत और आपूर्ति की अनिश्चितता के रूप में दिख रहा है। घरेलू बजट पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। इसी बीच पुणे के वैज्ञानिकों ने एक आशाजनक और स्वदेशी विकल्प खोजा है। यह विकल्प है डीएमई गैस, जो आयातित ईंधन पर भारत की निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकती है और देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत बना सकती है।
डीएमई गैस क्या है और कैसे बनाई जाती है
डीएमई यानी डाइमिथाइल ईथर एक स्वच्छ जलने वाला सिंथेटिक ईंधन है, जिसका इस्तेमाल खाना पकाने और घरेलू जरूरतों के लिए एलपीजी की तरह किया जा सकता है। इसे मेथेनॉल से बनाया जाता है, जो कोयला, बायोमास, कृषि अपशिष्ट और हवा से पकड़ी गई कार्बन डाइऑक्साइड से प्राप्त किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने स्वदेशी उत्प्रेरक विकसित किया है जो मेथेनॉल को डीएमई में बदलता है। यह प्रक्रिया नियंत्रित परिस्थितियों में होती है और तैयार उत्पाद को सीधे मौजूद एलपीजी सिलेंडरों में भरा जा सकता है।
एलपीजी के साथ अनुकूलता और उपयोग में आसानी
डीएमई की सबसे बड़ी विशेषता इसकी मौजूदा बुनियादी ढांचे के साथ अनुकूलता है। इसे एलपीजी के साथ 20% तक मिलाया जा सकता है, और 8% मिश्रण का इस्तेमाल मौजूदा गैस स्टोव, पाइपलाइन और रेगुलेटर में बिना किसी बदलाव के किया जा सकता है। इसका मतलब है कि आम परिवारों को नए उपकरण खरीदने की आवश्यकता नहीं होगी। डीएमई गैस एलपीजी का सहज और सुरक्षित विकल्प बनकर घरेलू उपयोग में आसानी और लागत बचत दोनों प्रदान करती है।
भारत के लिए आर्थिक और ऊर्जा लाभ
भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का लगभग 50-60% हिस्सा आयात करता है, ज्यादातर खाड़ी देशों से। यह विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डालता है और वैश्विक संकटों के समय जोखिम बढ़ा देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि एलपीजी की खपत का सिर्फ 8% हिस्सा भी डीएमई से बदलने पर भारत सालाना लगभग ₹9500 करोड़ बचा सकता है। यह न केवल आयात पर निर्भरता कम करेगा बल्कि घरेलू ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को भी मजबूत करेगा।







