भोपाल की पहचान पर छिड़ी जंग– अलोक शर्मा के बयान से सियासी तूफ़ान और समुदायों में टकराव

By: MPLive Team

On: Tuesday, August 26, 2025 5:43 PM

भोपाल की पहचान पर छिड़ी जंग– अलोक शर्मा के बयान से सियासी तूफ़ान और समुदायों में टकराव
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मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल इन दिनों एक नए विवाद का केंद्र बनी हुई है। यह विवाद भाजपा सांसद आलोक शर्मा के बयान के बाद शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने कहा कि भोपाल का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है और यह सम्राट अशोक, परमार वंश, राजा भोज और रानी कमलापति का भोपाल है। उन्होंने यह भी कहा कि भोपाल का इतिहास मुसलमानों से नहीं जुड़ा है और यहां प्रारंभ से ही हिंदू शासक रहे हैं। सांसद के इस बयान पर मुस्लिम समुदाय ने आपत्ति जताई है और इसे ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ बताया है।

कांग्रेस का पलटवार

जैसे ही आलोक शर्मा का यह बयान सामने आया, मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतु पटवारी ने सरकार और भाजपा पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि भोपाल देश का है, मध्यप्रदेश का है और यहां के हर नागरिक का है। पटवारी ने सांसद की आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह के बयान न तो जनता का भला करेंगे और न ही भाजपा को फायदा पहुंचाएंगे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा संविधान में विश्वास नहीं करती, और उसकी नीतियां दलितों तथा आम नागरिकों के खिलाफ रही हैं। कांग्रेस ने इसे चुनावी राजनीति से जुड़ा बयान करार दिया।

भोपाल की पहचान पर छिड़ी जंग– अलोक शर्मा के बयान से सियासी तूफ़ान और समुदायों में टकराव

मुस्लिम समुदाय का विरोध और प्रतिक्रिया

सांसद के बयान पर भोपाल में मुस्लिम समुदाय ने भी खुलकर आपत्ति जताई। बड़ी संख्या में लोग सड़क पर उतरे और चौराहों पर इकट्ठा होकर विरोध प्रदर्शन किया। समुदाय का कहना था कि भोपाल न तो केवल मुसलमानों का है और न ही केवल हिंदुओं का, बल्कि यह पूरे भारतवासियों का है। उन्होंने सांसद आलोक शर्मा से बयान वापस लेने और माफी मांगने की मांग की। मुस्लिम नेताओं का कहना है कि इस तरह के बयान सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ने का काम करते हैं और भोपाल की गंगा-जमुनी तहज़ीब को ठेस पहुंचाते हैं।

इतिहास क्या कहता है?

इतिहासकारों के अनुसार, भोपाल का निर्माण गोंड राजाओं ने करीब 1500 वर्ष पूर्व किया था। बाद में इसका नाम परमार शासक राजा भोज से जुड़ा और इसे ‘भोजपाल’ कहा जाने लगा। यह इलाका 14वीं शताब्दी तक गोंड साम्राज्य के अधीन रहा। 17वीं शताब्दी में रानी कमलापति के समय अफगान सैनिक दोस्त मोहम्मद खान ने यहां कब्ज़ा कर इस्लामी शासन की स्थापना की। इसके बाद भोपाल नवाबों के अधीन रहा और 1949 में भारत गणराज्य में विलय हुआ। यही कारण है कि अब तक भोपाल की ऐतिहासिक पहचान में हिंदू और मुस्लिम दोनों शासकों का योगदान माना जाता रहा है। इतिहास की इस साझा धरोहर पर राजनीति करना सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विवाद को और गहरा कर सकता है।

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