भारतीय जनता पार्टी की फायरब्रांड नेता और मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने एक बार फिर बड़ा बयान देकर राजनीतिक माहौल गरमा दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत का अंतिम लक्ष्य पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) को वापस लेना है और यह संसद का भी संकल्प है। उमा ने कहा कि जो लोग भारतीय सेना की क्षमता पर सवाल उठाते हैं, वे राजनीति करने के लायक भी नहीं हैं। उनका मानना है कि आतंकवाद एक दिन पाकिस्तान को खुद ही तबाह कर देगा और तब पीओके स्वाभाविक रूप से भारत का हिस्सा बनेगा। उन्होंने कहा कि “हमारा उद्देश्य तभी पूरा होगा जब पीओके वापस आ जाएगा।”
काशी और मथुरा में मंदिर निर्माण की इच्छा
उमा भारती ने काशी और मथुरा विवाद पर भी खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि यह मामले अदालत में विचाराधीन हैं, लेकिन एक हिंदू होने के नाते उनका मन चाहता है कि काशी और मथुरा में भी भव्य मंदिर बने। उन्होंने याद दिलाया कि 1991 में धार्मिक स्थल कानून पर संसद में बहस के दौरान भी उन्होंने काशी और मथुरा का मुद्दा उठाया था। उमा ने कहा कि “मेरा विश्वास चाहता है कि काशी और मथुरा में मंदिर हों, जैसे अयोध्या में श्रीराम मंदिर का सपना पूरा हुआ है।”

कांग्रेस और नेताओं पर साधा निशाना
उमा भारती ने कांग्रेस और मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी पर भी जमकर निशाना साधा। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि “जीतू पटवारी बिना सोचे-समझे बयान देते हैं, वे बेचारे हैं। कांग्रेस खत्म हो चुकी है, वे ही उसके अकेले नेता बचे हैं। बाकी या तो बीजेपी में आ चुके हैं या राजनीति से रिटायर हो गए हैं।” उन्होंने आदिवासी समाज की पारंपरिक शराब का बचाव करते हुए कहा कि यह स्वास्थ्य को नुकसान नहीं पहुंचाती और इसका दुरुपयोग भी नहीं होता। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि वे चुनाव लड़ने से पीछे नहीं हटेंगी, लेकिन तभी मैदान में उतरेंगी जब उन्हें लगेगा कि समय सही है और जनता उनके साथ खड़ी है।
मालेगांव ब्लास्ट, व्यापम और योगदान की उम्र पर विचार
पूर्व मुख्यमंत्री ने 2008 मालेगांव ब्लास्ट और व्यापम घोटाले पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि “व्यापम में मेरा नाम भी जोड़ा गया, लेकिन सच्चाई क्या है, यह सबको पता है। मालेगांव ब्लास्ट में निर्दोष लोगों के नाम क्यों जोड़े गए और असली अपराधी आज तक क्यों नहीं पकड़े गए?” उमा भारती ने राजनीति में रिटायरमेंट आयु पर चल रही बहस पर कहा कि योगदान की कोई उम्र नहीं होती। उन्होंने उदाहरण दिया कि जैसे पेड़ अपने फल खुद नहीं खाता और नदी अपना पानी नहीं पीती, वैसे ही योगदान की क्षमता कभी खत्म नहीं होती। उन्होंने कहा कि वे किसी एनजीओ से जुड़ना नहीं चाहतीं क्योंकि उनका काम जनता के बीच रहकर ही पूरा होता है, जैसे उन्होंने शराबबंदी आंदोलन के दौरान बिना किसी मंच या सभा के सिर्फ शराब की दुकानों के सामने खड़े होकर जनता को साथ जोड़ लिया था।







