मोहन राज में विकास के नए आयाम गढ़ता एमपी का सिंगरौली जिला,कहीं छीन न ले इंदौर से व्यवसायिक राजधानी का तमगा.

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सिंगरौली।। MP का सिंगरौली जिला, ये वही जिला है जिसे कभी काला पानी की सजा के लिए जाना जाता था, लेकिन अब इसकी पहचान देश विदेश को रोशन करने में होने लगी है। इसी इलाके से बिजली बनती है और यह देश ही नही बल्कि विदेश को भी उजाला प्रदान करती है। इसके अलावा यहाँ खनिज सम्पदाओं की अचूक भंडार है। यहाँ कोयले की बड़ी बड़ी खान, सोने की खान सहित अन्य अयस्क के भंडार मौजूद है। यहाँ की धरती अब सोना उगलने लगी है। यही वजह है कि अब इस इलाके में खनिज सम्पदाओं की संपन्नता की वजह से उद्योगों की झड़ी लग गई और विकास के नए नित आयाम गढ़ता चला जा रहा है।

सिंगरौली ने तय किया काले पानी से लेकर काले हीरे तक का रोमांचक सफर

सिंगरौली ये वहीँ धरती है जिसे लोग अब काले हीरे की धरती कहतें है। यहाँ कभी घनघोर जंगल था, साफ हवा और नदियाँ थीं। लोग खेती करते थे, मवेशी पालते थे और शांतिपूर्ण जीवन जीते थे। लेकिन आज यह जगह सिर्फ धुएँ, राख और विस्थापन की पहचान बन चुकी है।

विस्थापन का दंश झेल रहे सिंगरौली जिले के खजूरी (नगवां) गाँव निवासी शिव कुमार पाण्डेय बताते है कि 1954 में जब रिहंद बांध बनाने का ऐलान हुआ, तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह हमारी खुशियों को डुबो देगा। 146 गांव पानी में समा गए। लोगों के घर, खेत, मंदिर–सब कुछ डूब गया। देश को बिजली मिली, लेकिन हमें मिला सिर्फ़ दर्द और बेघर होने का ग़म। मेरे दादा कहते थे, “हमारे सपने पानी के साथ बह गए।”

1962 में जब बरसात आई और रेनूकुट की पहाड़ियों के बीच पानी भर गया तो चारों ओर हाहाकार मच गया। लोग समझ नहीं पा रहे थे कि पहले बच्चों को बचाएँ, जानवरों को या घर का सामान। कहीं मैदानी इलाकों में पानी भर रहा था, तो कहीं घने जंगल और पहाड़ रास्ता रोक रहे थे। वह दिन आज भी बुजुर्गों की आँखों में डर बनकर तैर जाता है।

सोचा था कि शायद यह दुख यहीं खत्म हो जाएगा, लेकिन मुश्किल से दो साल बीते होंगे कि सरकार की नज़र हमारे जंगलों और पहाड़ों पर भी पड़ गई। 1965 में झींगुरदह कोयला खदान खुली और लोगों को फिर उजाड़ दिया गया। उसके बाद तो जैसे सिलसिला ही शुरू हो गया। एक-एक कर खदानें खुलती गईं, पावर प्लांट बनते गए, और हर बार हमें अपने घर छोड़ने पड़े।

आज छह दशक हो चुके हैं। लेकिन हालात अब भी नहीं बदले। हवा ज़हरीली है, पानी में रसायन घुले हैं, राख की परत हमारे खेतों को बंजर बना चुकी है। नदियाँ मर रही हैं, जंगल और पहाड़ खंडहर में बदल गए हैं। इंसान तो पलायन कर ही रहे हैं, जानवरों तक ने यहाँ रहना छोड़ दिया है। ऐसा लगता है जैसे सैकड़ों गिद्ध सिंगरौली पर टूट पड़े हों, और कुछ भी बाकी नहीं बचेगा।

सबसे बड़ी चोट यह है कि हमें कभी सही मुआवज़ा नहीं मिला, न ही कोई ठोस पुनर्वास योजना बनी। हमसे बार-बार घर छीने गए, लेकिन हमें बस खोखले वादे मिले।

अब तो सुनने में आ रहा है कि मोरबा शहर भी उजड़ने वाला है। यहां की ज़मीन के नीचे करोड़ों टन कोयला दबा है। सरकार ने खनन की मंज़ूरी दे दी है। जल्द ही यहां बने 22 हज़ार से ज्यादा मकान तोड़े जाएंगे। स्कूल, कॉलेज, अस्पताल सब कुछ जमींदोज कर दिया जाएगा। कहा जा रहा है कि 50 हज़ार लोग विस्थापित होंगे, लेकिन सच्चाई यह है कि करीब 1 लाख लोग बेघर हो जाएँगे।

आज सोचता हूं। क्या यही विकास है? अगर देश को रोशनी देने के लिए सिंगरौली के लोगों का जीवन अंधेरे में धकेलना पड़े, तो यह कैसा न्याय है? हमारे जंगल, हमारी नदियाँ, हमारा अस्तित्व सब मिटा दिया गया। कभी लगने वाला स्वर्ग आज धीरे-धीरे नरक में बदल रहा है। क्या यही विकास की परिभाषा है?

कोयला और बिजली उत्पादन के मामले में सिंगरौली सिरमौर कैसे बना?

कभी काले पानी की सजा इसी इलाके में दी जाती थी आज यही सिंगरौली देश की सबसे बड़ी जरूरत बनकर उभरा है। कोयला तथा बिजली उत्पादन में देश की रीढ़ की हड्डी साबित हो रहा है सिंगरौली। बता दें राजाओं के जमाने में जब किसी को काले पानी की सजा देनी होती तो उसे सिंगरौली भेजा जाता था। यही सिंगरौली आज काले हीरे यानी कोयले के उत्पादन में देश में नाम रोशन कर रहा है। वर्तमान में सिंगरौली देश के कुल कोयले में अहम योगदान दे रहा है। सिंगरौली कोल इंडिया की इकाई कंपनी नॉर्दर्न कोलफील्ड लिमिटेड एनसीएल (NCL) के सहारे खदानों से निकला कोयला 90% बिजली घरों को देता है।

देश में कोयले की आपूर्ति में सिंगरौली का हिस्सा 15 फीसदी

सिंगरौली में एनसीएल की 10 परियोजनाओं की खदानें संचालित हो रही हैं। कोयला उत्पादन कर एनसीएल देश के कुल बिजली उत्पादन का 10% अकेले आपूर्ति कर रहा है। इसके साथ ही देश व प्रदेश की झोली राजस्व के जरिए भर रहा है। कोयला तथा बिजली उत्पादन के लिए सिंगरौली खास इसलिए भी है, क्योंकि यहां जितना कोयला उत्पादन होता है, वह देश में होने वाले कुल कोयला उत्पादन का 15% है। सिंगरौली की कोयला खदानों से निकला काला हीरा का सबसे ज्यादा उपयोग पावर सेक्टर की कंपनियां करती है।

सिंगरौली में निकलने वाला कोयला उच्च क्वालिटी का

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सिंगरौली के एनसीएल की खदानों में निकलने वाला कोयला बिटुमिनस कोयला होता है। अधिकांश खदानों में यह कोयला तीन परतों में पाया जाता है लेकिन कुछ खदानों में यह कोयला दो परत तक ही सीमित है। यहां की एक खदान है झींगुरदह, जहां इस खदान में कोयले की सबसे मोटी परत पाई जाती है। कोयले की गुणवत्ता और अपनी कोयले की परतों के लिए भी सिंगरौली देश के अन्य खदानों से विशेष है, क्योंकि यहां पर 03 परत में कोयला पाया जाता है और कहीं-कहीं तो बड़ी और मोटी परत की वजह से कोयला उत्पादन में बढ़ोतरी भी होती रहती है। एनसीएल प्रतिदिन 3 लाख 50 हजार मीट्रिक टन से ज्यादा कोयला उत्पादन करता है।

देश विदेश को रोशन करने में सिंगरौली का अहम भूमिका

हमारा देश भारत तेजी बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था वाला देश है। जिसकी अब दुनियाभर में अलग पहचान बना रहा है। भारत के बढ़ते अर्थव्यस्था में ऊर्जा का विशाल योगदान है। भारत का सबसे बड़ा थर्मल पावर प्लांट मध्य प्रदेश राज्य के सिंगरौली जिले में स्थित है। जिसका नाम विंध्याचल थर्मल पावर स्टेशन है।

यह पावर स्टेशन एनटीपीसी के कोयला आधारित बिजलीघरों में से एक, यह भारत का सबसे बड़ा बिजलीघर है। जिसकी स्थापित क्षमता 4,760 मेगावाट है और कुल उत्पादन 4783 मेगावाट है। विंध्याचल सुपर थर्मल पावर प्लांट क्षेत्रीय विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह प्लांट ऊर्जा सुरक्षा और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। न केवल मध्य प्रदेश बल्कि पूरे भारत की ऊर्जा जरूरतों में महत्वपूर्ण योगदान देता है विंध्याचल थर्मल पावर प्लांट की स्थापना 1987 में हुई थी। यह प्लांट राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (NTPC) द्वारा संचालित है।

यहाँ से मिलता है सरकार को सबसे ज्यादा राजस्व

2024-25 वित्तीय वर्ष में, सिंगरौली जिले ने मध्य प्रदेश सरकार के खजाने में 4,080 करोड़ रुपये का कुल राजस्व योगदान दिया है। यह राशि जिले को प्रदेश स्तर पर राजस्व देने के मामले में शीर्ष स्थान पर रखती है।

यह राजस्व मुख्य रूप से जिले के खनिज (कोयला) और ताप विद्युत उद्योगों से प्राप्त होता है, क्योंकि सिंगरौली को “ऊर्जाधानी” के रूप में जाना जाता है। खनन विभाग ने राजस्व के इस लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कभी रीवा सियासत का हिस्सा था ये इलाका

सिंगरौली एमपी का 50वां जिला है। 24 मई, 2008 में नया जिला बनने से पहले ये सीधी जिले का हिस्सा हुआ करता था। इसकी सीमा यूपी के सोनभद्र जिले से मिलती है। ऐतिहासिक तौर पर सिंगरौली कभी रीवा रियासत का हिस्सा हुआ करती था, जो बघेलखंड क्षेत्र में आता था। कभी ये इलाका ऋषि श्रृंगी की तपोभूमि हुआ करता था, इसलिए प्राचीनकाल में सिंगरौली का नाम श्रंगावली हुआ करता था।

जनसरोकार के मुद्दों को कवर करने वाले पत्रकार राजनारायण पांडेय कहते हैं कि अब मोरबा शहर भी उजड़ने वाला है। यहां की ज़मीन के नीचे करोड़ों टन कोयला दबा है। सरकार ने खनन की मंज़ूरी दे दी है। जल्द ही यहां बने 22 हज़ार से ज्यादा मकान तोड़े जाएंगे। स्कूल, कॉलेज, अस्पताल सब कुछ जमींदोज कर दिया जाएगा। कहा जा रहा है कि 50 हज़ार लोग विस्थापित होंगे, लेकिन सच्चाई यह है कि करीब 1 लाख लोग बेघर हो जाएँगे।

आज सोचता हूं। क्या यही विकास है? अगर देश को रोशनी देने के लिए सिंगरौली के लोगों का जीवन अंधेरे में धकेलना पड़े, तो यह कैसा न्याय है? हमारे जंगल, हमारी नदियाँ, हमारा अस्तित्व सब मिटा दिया गया। कभी लगने वाला स्वर्ग आज धीरे-धीरे नरक में बदल रहा है।

वहीँ सिंगरौली विधायक रामनिवास शाह ने सिंगरौली के काले पानी से लेकर काले हीरे तक के सफर में कहा कि पहले यहाँ काले पानी की सजा दी जाती थी। लेकिन समय के दौर में आज यहाँ विकास की झड़ी लग गई है। यह इलाका अब देश को रोशन करने में अपना अहम योगदान दे रहा है।

 

देवेन्द्र पाण्डेय "संपादक"

ऋषि श्रृंगी मुनि की तपोभूमि सिंगरौली की पावन धरा से निकला. पठन-पाठन से प्यार था लिहाजा पत्रकारिता से बेहतर पेशा कोई और लगा नहीं. अखबार से शुरु हुआ सफर टीवी और डिजिटल मीडिया के माध्यम में जारी है. इस दौरान करीब 14 साल गुजर गए पता ही नहीं चला. Read More
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